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सावन बरसे तो बरसे नैन क्यू नीर रहे बारसाय।

डॉ श्यामाप्रसाद

भारतवर्ष

ठोकर मैं नित्य खाऊँ फिर भी साधु न पाऊं

योग दिवस

हियो श्याम तन लाग्यो अब तो सुध लीजे।

प्रभुजी मेरे अन्त: धीर धारावो।

जिनके प्रबल भुजदंड प्रचंड कोदंड निरन्तर उठाये।

सृष्टि रचियेता मार्ग मेरा प्रशस्त कर।

दुनिया में विश्वास

दूर कर मैया अंतर्निहित भय मन का।

नटखट छोड़ तुझे , रहो न जाय।

बैर क्रोध आलस्य मद छोड ,गाओ गीत कृपा - निधान के।

हे जगस्वामी।।

यह मेरा प्रेमनगर मस्ती भरी मधुशाला