सृष्टि रचियेता मार्ग मेरा प्रशस्त कर।

सृष्टि रचियेता मार्ग मेरा प्रशस्त कर ।
ओ  सामवेद  के समवेत स्वर, चित्त परिष्कृत अभ्यस्त कर।
अंतस   झंकृत  करते  निनाद,  और   वेद  ऋचाएं  विज्ञ  हों 
समुद्र  मंथन  करती  मेरी, सतत  प्रवृतियां  दृढ़  प्रतिज्ञ  हों।
चित्त  दुराषा  शांत  करूँ  मैं, भावनाओं को  कर  उत्सर्जित
मनःस्थली  बना कर  मन्दिर, मैं ज्योति पुंज करूँ प्रभाषित।
सुकृत  जीवन आनंद  रसमय, आत्मा से  प्रबोध समस्त कर
'इंदु' विशाल व्योम पूर्ण ब्रह्म, जीवात्मा का भ्रम निरस्त कर।
सृष्टि रचियेता मार्ग मेरा प्रशस्त कर ।

आज का दोहा:
वेद  ज्ञान  की   कुशलता, देती श्री धन धान्य
सात्विक श्रुत यह विज्ञ को, बनाती सर्व मान्य

सुरेश चौधरी 'इंदु'
कोलकाता 
9830010986
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