योग दिवस
======योग=========
योग दिवस पर विशेष
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समाध्यर्थाद् युजेर्धातो योर्गशब्द: सुसिद्धयति।
चित्तवृत्तिनिरोधोअ्तो योगेनैव भवेद् ध्रुवम्।।
चित्तवृत्ति निरोध यानि समाधि अर्थ वाले 'युजिर्' धातु से ही 'योग' शब्द की निष्पत्ति हुई है। अतः योग से निश्चित ही चित्तवृत्ति का निरोध होता है। शुभम् अस्तु।।
टिप्पणी :- महर्षि पतञ्जलि ने 'योगश्चित्तवृत्ति निरोध:' में योग व चित्त निरोध में समानाधिकरण द्वारा इस पद को भाव-व्युत्पन्न माना है, अर्थात् 'योग' किसी अवस्था विशेष का नाम है, जिसमें सभी चित्तवृत्तियां शान्त हो जाती हैं। उपरोक्त पद्य में 'योगेन' इस तृतीयान्त पद द्वारा 'योग' शब्द करण व्युत्पन्न माना गया है। जिसका अर्थ हुआ, ऐसा उपाय जिससे चित्तवृत्ति निरोध हो, यहाँ योग क्रियात्मक ( Active ) संज्ञा है, यह योग के सर्व साधारण में प्रचलित प्रयोग के अनुसार है। योग का अर्थ व्यापक है।
दैहिक मानसिक शून्य चिंतन, से निरोग का नाम योग है अद्भुत आसन ध्यान धारणा, के संयोग का नाम योग है।
हरण हो चित्त की वृतियों का, यह उद्देश्य योग कहलाता
कुशल कर्म की उपादेयता, का यह ध्येय योग कहलाता।
लय योग से आत्म संचालन, मन्त्र योग से मन श्रेष्ठ करो
राजयोग अष्टांग प्रक्रिया, हठ योग पिंगला इड़ा धरो।
यम नियम प्रत्याहार धारणा, समाधि संग ज्ञान प्राप्त हुआ
भक्ति आचरण कर्म व्यवहार, ज्ञान सब ज्ञात प्रयाप्त हुआ।
मन जैसे ही उद्वेलित हो, अशांत और तन विचलित करे
प्राणायाम ही आत्मकेंद्रित, हो नेतृत्व संकलित करे।
आत्मा ही केंद्र बिंदु है आत्मा ही देह संचालित करती
आत्मा से अद्वेत मिलन कर्म, ज्ञान योग से भाषित करती।
दैहिक मानसिक शून्य चिंतन, से निरोग का नाम योग है
अद्भुत आसन ध्यान धारणा, के संयोग का नाम योग है।
योग नहीं है धर्म प्रसारण, योग मात्र तन-मन शुद्धि करे
मिलाप यह आत्मा से मन का, ये सब बातें है बुद्धि धरे।
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