भारतवर्ष
भारतवर्ष
हमारे देश के बारे में वायु पुराण में ही उल्लिखित है कि हिमालय पर्वत से दक्षिण का वर्ष अर्थात क्षेत्र भारतवर्ष
है। इस विषय में देखिए वायु पुराण क्या कहता है—-
हिमालयं दक्षिणं वर्षं भरताय न्यवेदयत्।
तस्मात्तद्भारतं वर्ष तस्य नाम्ना बिदुर्बुधा:।।
संस्कृत में वर्ष शब्द के तीन अर्थ बताए गए हैं, वर्ष-साल, वर्ष- वर्षा होने का भाव, वर्ष-द्वीप, क्षेत्र, भूमि खंड।
पुराणानुसार जंबू द्वीप के अंतर्गत नौ वर्षों या खंडों में से एक जो हिमालय के दक्षिण ओर गंगोत्तरी से लेकर कन्याकुमारी तक और सिंधु नदी से ब्रह्मपुत्र तक फैला हुआ है । आर्यावर्त । ब्रह्मपुराण में इसे भरतद्वीप लिखा है और अंग, यव, मलय, शंख, कुश और बाराह आदि द्वीपों को इसका उपद्वीप लिखा है जिन्हें अब अनाम, जावा, मलय, आदि कहते हैं और जो भारतीय द्वीपपुंज के अँर्तगत माने जाते हैं । ब्रह्मांडपुराण में इसके इंद्रद्वीप, कशेरु, ताम्रपर्ण, गभस्ति- मानु, नागद्वीप, साम्य, गंधर्व और वरुण ये नौ विभाग बतलाए गए हैं और लिखा है कि प्रजा का भरण पोषण करने के कारण मनु को भरत कहते हैं । उन्हीं भरत के नाम पर इस देश का नाम भारतवर्ष पड़ा । कुछ लोगों का मत है कि दुष्यतं के पुत्र भरत के नाम पर इस देश का नाम 'भारत' पड़ा । इसी प्रकार भिन्न-भिन्न पुराणों में इस संबंध में भिन्न-भिन्न बातें दी हैं ।
लेकिन वही पुराण इससे अलग कुछ दूसरी साक्षी प्रस्तुत करता है। इस ओर हमारा ध्यान नही गया, जबकि पुराणों में इतिहास ढूंढ़कर अपने इतिहास के साथ और अपने आगत के साथ न्याय करना हमारे लिए बहुत ही आवश्यक था। तनक विचार करें इस विषय पर:-आज के वैज्ञानिक इस बात को मानते हैं कि प्राचीन काल में साथ भूभागों में अर्थात महाद्वीपों में भूमण्डल को बांटा गया था। लेकिन सात महाद्वीप किसने बनाए क्यों बनाए और कब बनाए गये।
इस ओर अनुसंधान नही किया गया। अथवा कहिए कि जान पूछकर अनुसंधान की दिशा मोड़दी गयी। लेकिन वायु पुराण इस ओर बड़ी रोचक कहानी हमारे सामने पेश
करता है।
वायु पुराण की कहानी के अनुसार त्रेता युग के प्रारंभ में अर्थात अब से लगभग 22 लाख वर्ष पूर्व स्वयम्भुव मनु के पौत्र और प्रियव्रत के पुत्र ने इस भरत खंड को बसाया था। प्रियव्रत का अपना कोई पुत्र नही था इसलिए उन्होंने अपनी पुत्री का पुत्र अग्नीन्ध्र को गोद लिया था। जिसका लड़का नाभि था, नाभि की एक पत्नी मेरू देवी से जो पुत्र पैदा हुआ उसका नाम ऋषभ था। इस ऋषभ का पुत्र भरत था। इसी भरत के नाम पर भारतवर्ष इस देश का नाम पड़ा। उस समय के राजा प्रियव्रत ने अपनी कन्या के दस पुत्रों में से सात पुत्रों को संपूर्ण पृथ्वी के सातों महाद्वीपों के अलग-अलग राजा नियुक्त किया था।
राजा का अर्थ इस समय धर्म, और न्यायशील राज्य के
संस्थापक से लिया जाता था। राजा प्रियव्रत ने जम्बू द्वीप
का शासक अग्नीन्ध्र को बनाया था। बाद में भरत ने
जो अपना राज्य अपने पुत्र को दिया वह भारतवर्ष कहलाया।
भारतवर्ष का अर्थ है भरत का क्षेत्र। भरत के पुत्र का नाम
सुमति था। इस विषय में वायु पुराण के निम्न श्लोक पठनीयहैं—
सप्तद्वीपपरिक्रान्तं जम्बूदीपं निबोधत।
अग्नीध्रं ज्येष्ठदायादं कन्यापुत्रं महाबलम।।
प्रियव्रतोअभ्यषिञ्चतं जम्बूद्वीपेश्वरं नृपम्।।
तस्य पुत्रा बभूवुर्हि प्रजापतिसमौजस:।
ज्येष्ठो नाभिरिति ख्यातस्तस्य किम्पुरूषोअनुज:।।
नाभेर्हि सर्गं वक्ष्यामि हिमाह्व तन्निबोधत। (वायु 31-37, 38)
इन्हीं श्लोकों के साथ कुछ अन्य श्लोक भी पठनीय हैं
जो वहीं प्रसंगवश उल्लिखित हैं।
हम अपने घरों में अब भी कोई याज्ञिक कार्य कराते हैं
तो उसमें पंडित जी संकल्प कराते हैं। उस संकल्प मंत्र
को हम बहुत हल्के में लेते हैं, या पंडित जी की एक धार्मिक अनुष्ठान की एक क्रिया मानकर छोड़ देते हैं। लेकिन उस संकल्प मंत्र में हमें वायु पुराण की इस साक्षी के समर्थन में बहुत कुछ मिल जाता है। जैसे उसमें उल्लेख आता है-
जम्बू द्वीपे भारतखंडे आर्याव्रत देशांतर्गते….। ये
शब्द ध्यान देने योग्य हैं। इनमें जम्बूद्वीप आज के यूरेशिया के लिए प्रयुक्त किया गया है। इस जम्बू द्वीप
में भारत खण्ड अर्थात भरत का क्षेत्र अर्थात ‘भारतवर्ष’ स्थित है, जो कि आर्याव्रत कहलाता है। इस संकल्प के द्वारा हम अपने गौरवमयी अतीत के गौरवमयी इतिहास का व्याख्यान कर डालते हैं।

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