श्री राम एवं उनकी अयोध्यो......महत्ता (भाग-२ )
भाग -२ (राम की
अयोध्या और सम्राटों का चरित्र )
श्री राम की महत्ता
कुछ प्रसंगों के माध्यम से ......
“मन की गति से उड़ता
पुष्पक विमान जब अवधपुरी के दर्शनयोग्य क्षितिज पर पहुंच गया तो विह्नल ,अधीर
राम उन दर्शनो को नेत्रस्थ करके जैसे बालसम हो गए ,उछल पड़े !
आ गई अवधपुरी ,ओह्ह ! मेरा घर ,मेरी
भूमि ।
उस भयंकर राक्षस से
प्राणोपान्त युद्ध मे भी क्षण भर को जो विचलित ना हुए उन "मर्यादा
पुरुषोत्तम" राम की यह अधीरता देख कर सभी विस्मित थे लेकिन प्रश्न नही थे
किसी के हृदय में ,
होते भी क्यों ?? उत्तर तो दे चुके थे राम जब
विभीषण के लंका पर शासन करने के आत्मीय निवेदन को सविनय अस्वीकार्य कर चुके राम से
लक्ष्मण ने पूछा था की आखिर क्यों जाए वहाँ जहाँ इतना बड़ा अन्याय हुआ था हमारे साथ
??क्यों नही इस सर्व सुविधायुक्त ऐश्वर्यशाली नगरी पर शासन
करे ??
तब कहा था राम ने
अपना अंतस अनावृत कर.........
" यद्यपि
स्वर्णमयीम् लंका ,न मे लक्ष्मण रोचते ,
जननी जन्मभूमिश्च
स्वर्गादपि गरि्यसि ।
"भ्राता लक्ष्मण
! निसंदेह सर्व ऐश्वर्यों से युक्त यह स्वर्णमयी लंका विभीषण के समर्पण सहित
उपलब्ध है फिर भी मेरी इसमे कोई रुचि नही है , माता और मातृभूमि स्वर्ग से
भी बढ़कर है ।" गोविन्द पुरोहित की वाल से....
यह है राम की अयोध्या
और यह है उसकी महत्ता जिसे कोई कैसे भुला सकता है, जब मन में निज स्थान की झलक
मिले और मन आलोडित हो तो वहीँ अयोध्या होती है और वह पल ही दीपावली का होता है,
==
संसार के हरेक
राष्ट्र का उत्थान और पतन समय-समय पर होता रहता है। यह प्रकृति का नियम है। हमारी
मातृभूमि भारतवर्ष के साथ भी ऐसा ही हुआ। सम्पूर्ण विश्व में हमारी सभ्यता, संस्कृति
के साथ-ही-साथ ज्ञान की पताका फहरा रही थी
परंतु एक विशेष कालखंड में हमारा भी पतन हुआ। आक्रांताओं ने राजसत्ता को तो
हानि पहुँचाई ही साथ ही हमारे धर्मसत्ता
पर भी प्रहार किया । इस क्रम में आक्रांताओं ने हमारे धर्मग्रंथो को प्रदूषित करना
शुरू किया वह भी बड़ी चालाकि के साथ। कैसे किया ? किन-किन
ग्रंथों में किया ? इसका उत्तर देने से पहले हमें भारतवर्ष
कि सत्ता को जानने का प्रयत्न करना चाहिये ।
भारतीय सत्ता का
स्वरूप
भारतवर्ष में
अनादिकाल से दो सत्तायें कार्यरूप में थी-एक थी धर्मसत्ता तो दूसरी थी राजसत्ता।
शुरू में धर्मसत्ता तथा राजसत्ता साथ ही थी। दोनों एक दूसरे कि आवश्यकताओं कि
पूर्ति करती थी। राजसत्ता प्रजा को सुरक्षा तथा सुख शान्ति प्रदान करती थी
धर्मसत्ता के कतिपय सिद्धांतों
धृतिः क्षमा दमो
स्तेयं शौचमिन्द्र- निग्रह:
धीर्विद्या सत्यम
अक्रोधो दशकम् धर्मलक्षणम- (मनुस्मृति)
अर्थात् धैर्य, क्षमा,
दम, अस्तेय, शौच,
इन्द्रिय-न- ग्रह, धी, विद्या,
सत्य और अक्रोध ये धर्म के दस लक्षण हैं, के
ही आधार पर थी |
एक तरह से धर्म का ही
राज्य था सर्वत्र। सतयुग के शुरू में साधारणतयाः- ऐसा ही था। सतयुग के अंत में तथा
त्रेतायुग में धर्म का क्षरण हुआ। राजसत्ता प्रभावी होने लगी। धर्मसत्ता का क्षरण
हो रहा था। धर्म कि ग्लानि हो रही थी-मर्यादाएं टूट रही थी। अतः मर्यादा
पुरूषोत्तम- भगवान श्रीराम का अवतरण हुआ-सुव्यवस्था-स्थापित हुई। रामराज्य आया।
साथ ही महर्षि वाल्मीकि जी ने वेद का सरलीकरण किया-श्रीवाल्मीकि रामायण के द्वारा।
धर्मसत्ता ने राजसत्ता के रूप में रामराज्य दिया और उसे स्थापित भी किया। राजसत्ता
तथा धर्मसत्ता फिर एक हुई ।
काल-चक्र घूमता
रहा-राजसत्ता ने मद में आकर धर्मसत्ता का साथ छोड़ना शुरू किया। आक्रांता
आये-राजसत्ता की लड़ाई शुरू हुई-राजसत्ता विदेशी आक्रांताओं के अधीन होती गई।
गुला
मी आ गई। धर्मसत्ता फिर भी निर्बाध तथा स्वतंत्र गति से चलती रही | आदि शंकर आये, धर्म को संगठित किया, चार मठ स्थापित किये, चारों मठों पर चारों वेदों तथा सम्पूर्ण भारतभूमि कि सुरक्षा का भार था, यह धारा अनवरत चल रही थी। बाद में मुगल आये; अंग्रेज़ आये।
मी आ गई। धर्मसत्ता फिर भी निर्बाध तथा स्वतंत्र गति से चलती रही | आदि शंकर आये, धर्म को संगठित किया, चार मठ स्थापित किये, चारों मठों पर चारों वेदों तथा सम्पूर्ण भारतभूमि कि सुरक्षा का भार था, यह धारा अनवरत चल रही थी। बाद में मुगल आये; अंग्रेज़ आये।
मुगलों ने मुख्यतया
हमारी राजसत्ता को नष्ट किया | धर्मसत्ता पर भी घोर प्रहार किया, फिर भी धर्मसत्ता चलती रही, ये पराधीन नहीं हुई।
परंतु अंग्रेजों ने
राजसत्ता के साथ-ही-साथ हमारी धर्मसत्ता के आधार को-हमारे धर्मग्रंथों खासकर आदि
काव्य को प्रदूषित किया,
इसका कारण था, हमारे समाज के आदर्श थे मर्यादा
पुरूषोत्तम; श्रीराम। इक्ष्वाकुवंशी श्रीराम में अनेक गुणों
यथा पराक्रम, धर्म, सत्यनिष्ठा,
प्रजावत्सलता, दृध्प्रतिग्य ज्ञाता, नीतिज्ञता, शत्रुसंहारकता इत्यादि सद्गुणों का
समावेश था। आदर्श सर्वश्रेष्ठ था तो समाज भी सर्वश्रेष्ठ था । (वा.रा. प्रथम.
सर्ग-शलोक 3,9,10)
326 ई.पू. सिकंदर ने
भारतवर्ष पर आक्रमण किया था | मेगास्थनीज ने हमारे समाज का चित्र खींचा
था | भारतीय युवक सत्यनिष्ठ हैं, बलशाली
हैं, चरित्रवान हैं, एक पत्नीव्रत हैं
चोरी कहीं नहीं होता है-आदि-आदि।
चीनी यात्री
ह्वेनसांग (जो 631 ई. से 641 ई. तक सम्राट हर्षबर्धन के समय आये थे) ने भी
भारतवर्ष का वर्णन करते हुये लिखा था; यहाँ के लोग सत्यवादी होते
हैं किसी को धोखा नहीं देते हैं, चारित्रिक रूप से शुद्ध
होते हैं, सभी भद्र पुरूष हैं।
सन् 1846 के आस पास
जर्मन विद्वान मैक्समूलर ने भी लिखा था- ‘‘यदि मुझसे पूछा जाय कि
सम्पूर्ण मानव समाज में सबसे अधिक बौद्धिक विकास कहाँ हुआ? कहाँ
सबसे बड़ी जटिल समस्याओं पर विचार हुआ? तो मैं भारतवर्ष कि
ओर संकेत करूँगा। यदि मुझसे पूछा जाय कि वह कौन सा सहित्य है जो हमारे आन्तरिक
जीवन को पूर्ण और सार्वभौम बना सकता है तो मैं वैदिक साहित्य कि ओर संकेत करूँगा।’’
फिरंगियों का
षडयंत्र- फुट डालो और राज करो
फिर 1835 ई. में
लार्ड मैकाले ने हमारे समाज का ठीक ऐसा ही वर्णन किया था | परंतु
हिन्दुस्तानियों को हृदय से फिरंगी बना दिया, शरीर से
हिन्दुस्तानी रहने दिया। ब्रिटेन का सब कुछ अच्छा तथा हिन्दुस्तानियों का सब कुछ
बुरा है। भारतवर्ष का इतिहास, पुराण, वेद
आदि सब कुछ झूठी कथाएँ है जो कपोल कल्पित हैं। इतिहास केवल 2000 साल ही पुराना है।
इस तरह कि विचारधारा को कूट कूट कर भरा जाने लगा क्योंकि अंग्रेजों का इतिहास तो
केवल 2000 वर्ष ही पुराना है और भारतवर्ष का इतिहास तो इससे भी हजारों वर्ष पहले
का है। जो हमारा स्वर्णिम समय था उसे तो उन्होंने कपोल कल्पित अर्थात् झूठा बताया
और जो अंग्रेजों का स्वर्णिम समय था उसे इतिहास बताया। इस तरह से इस राष्ट्र कि
अपनी पहचान, प्राचीन गौरव को खत्म कर दिया । इसी ब्रिटिश
मानसिकता ने हमारे धर्मग्रंथों को जो धर्मसत्ता का एक प्रमुख घटक था ;-प्रदूषित करने का षडयंत्र। हर आक्रांताओं की ऐसी ही मानसिकता होती है।
हमें किसी से द्वेष नहीं करना है पर सत्य का अन्वेषण तो होना ही चाहिए।
इसी क्रम में एक
सम्मेलन कि तरफ सभी का ध्यान दिलाना चाहते है जहाँ पर देश तथा विदेश के कई
विद्वानों ने श्रीमद् रामायण जी के सन्दर्भ में अपनी अपनी रिसर्च पेपर को पढ़ा था।
आइए इसके बारे में भी अवलोकन करें-
INDIAN EPIC VALUES, RAMAYAN AND ITS IMPACT
{PROCEEDING OF THE 8TH
INTERNATIONAL RAMAYAN CONFERENCE, LUVEN (HUNGARY)- 6-8
JULY, 1991, EDITED BY G.POLLET}
INDIAN EPIC VALUES, RAMAYAN AND ITS IMPACT
{PROCEEDING OF THE 8TH
INTERNATIONAL RAMAYAN CONFERENCE, LUVEN (HUNGARY)- 6-8
JULY, 1991, EDITED BY G.POLLET}
CHAPTER-2
Reception of Sanskrit Language and
Literature in the Scholary World- The Ramayan in Hungary
It happened all over in Europe that the
survey of Indian languages, literature and philosophies started in the 18th century and it flourished during the 19th
Century. The accomplishment of Indian studies took place in England, Germany
and France---. According to Schmidt, the orignal part of the Epic contained
about 6000 verses, ------ and how the first and the last
chapter have been added to the basic part?
इससे स्पष्ट है कि
भारतीय दर्शन,
साहित्य तथा भाषाओं का एक सर्वे 18वीं शताब्दी में शुरू हुआ था जो
19वीं शताब्दी में पूरा हुआ था। इसका उद्देश्य जो भी हो परंतु यह तो स्पष्ट है कि
बाल्मीकि रामायण का भारतीय मानस में अद्भुत प्रभाव था | ये
बातें उन्हें स्पष्ट हो गई होगी और ये भी पता होगा कि यही आदिकाव्य है। अतः इसे ही
क्यों निशाना बनाया गया यह तो स्पष्ट हो ही गया। हंगरी के विद्वान जे. स्मीड्ट (The
Old Indic Epics-1921) ने यह भी बताया है कि श्रीमद्वालमीकियरामायण
में शुरू में 6000 श्लोक थे (परंतु अभी 24000 श्लोक हैं) तथा एक और प्रश्न भी
उठाया है कि पहला और अन्तिम Chapters को इसमें क्यों और कब
जोड़ा गया। उन्होने एक और महत्वपूर्ण- जानकारी दी कि भगवान बुद्ध के बारे में
इसमें कुछ भी नहीं लिखा गया है। परंतु निम्नांकित प्रमाण-1 तथा प्रमाण-2 में
वाल्मीकिरामायण में इसके संदर्भ के बारे में बताया गया है। आइये कतिपय श्लोकों का
अनुशीलन करें।
प्रमाण-1 - अयोध्या
कांड का 109वाँ सर्ग श्लोक-34 में बुद्ध, तथागत का प्रयोग किया गया जो
उस समय असंभव था क्योंकि भगवान् श्रीराम के समय त्रेतायुग में भगवान बुद्ध का
अवतार नहीं हुआ था।
यथाहि चोरः स तथा हि बुद्धस्तथा- गतं
नास्तिकमत्- र विद्धि ।
तस्माद्ध- यः शक्यतमः प्रजानां स नास्तिके
नाभिमुखो बुधः स्यात ।।
अर्थात् जैसे चोर
दण्डनीय होता है उसी प्रकार (वेद विरोधी) बुद्ध (बौद्धमतावलम्बी) भी दण्डनीय है।
तथागत् बुद्ध और नास्तिक (चार्वाक) को भी यहाँ इसी कोटि में समझना चाहिये। इसलिये
प्रजापर अनुग्रह करने के लिए राजा द्वारा जिस नास्तिक को दण्ड दिलाया जा सके, उसे
तो चोर के समान दंड दिलाया ही जाये; परंतु जो वश के बाहर हो,
उस नास्तिक के प्रति विद्वान ब्राहमण कभी उन्मुख न हो-उससे
वार्तालाप तक न करे।
प्रमाण- -2-
उत्तरकांड 59 सर्ग के बाद -
प्रक्षिप्त सर्ग -1
श्रीराम् के पास कार्यार्थी- कुत्ते का आगमन तथा प्रक्षिप्त- सर्ग-2 कुत्ते के
प्रति श्रीराम का न्याय,
उसकि इच्छा के अनुसार उसे मारने वाले ब्राह्मण को मठाधीश बना देना
और कुत्ते का मठाधीश होने का देाष वताना ।
प्रमाण-3 - उत्तरकांड
का 74वा,
75वा, तथा 76वा सर्ग-
जिनमे- महर्षि नारद
जी के द्वारा एक तपस्वी शूद्र शम्बूक को ब्राह्मण बालक कि मृत्यु का कारण बताया
गया तथा श्रीराम द्वारा शंबूक का वध करना और ब्राह्मण बालक का तत्काल जी उठना।
हो सकता है इन सबके
अलावे और भी जगह-शब्दों का,
श्लोकों का और सर्गों का भी प्रक्षेपण किया गया हो-और अच्छे श्लोकों,
शब्दों या सर्गो को हटा भी दिया गया हो-जो हमारे संस्कृति के गौरव
को या राष्ट्रीयता को प्रखर रूप से दिखाता हो-ऐसा ही एक सुंदर श्लोक है-
अपि स्वर्णमयी लंका न
मे लक्ष्मण रोचते।
जननी- जन्म भूमिश्च
स्वर्गादपि- गरीयसी।।
अथार्थ हे लक्ष्मण!
ये स्वर्णमयी लंका भी मुझे अच्छी नहीं लगती है। जननी तथा जन्मभूमि स्वर्ग से भी
बढ़कर होती है।
यह एक ऐसा श्लोक है
जिसके बारे में यह कहा जाता है कि ये वा.रा. में युद्धकांड में कहा गया है परंतु
पूरे वा. रामायण में कहीं भी नहीं है। होना तो चाहिये परंतु क्यों हटाया गया है? इसके
बारे में हमें गंभीरता पूर्वक विचार करना चाहिए।धर्म संसद बुलाकर इन सब बातों पर
गहन विचार विमर्श कर अगर उचित समझें तो वाल्मीकियरामायण में इसका उल्लेख प्रमुख
रूप से करने के बारे में सोचे।
रूपं देहि, जयं देहि, यशो देहि, द्विषो जेहि
दुर्गासप्तशती
के इस श्लोक में तीन कामना है ये तीन कामनायें सम्पूर्ण है, ये
तीन जब मिल जाय तो जीवन पूर्ण आनंद भूषित हो जाता है परन्तु जब इन तीनो का मद
व्यक्ति के अन्दर समावेशित हो जाता है तो यह महान हानिकारक होता है. तभी अंत में
देवी से मांगते हैं द्विषो जेहि अर्थ इसका अहंकार द्वेष भाव न आये.
भारतीय
शास्त्रों में कई शास्त्र निति शास्त्र हैं जैसे की विदुर निति, भृतहरि
का निति शतक, चाणक्य निति, योग वशिष्ठ,
इत्यादि इत्यादि, पुराणों में भी जगह जगह निति
गत श्लोक लिखे गए हैं. शास्त्रों के अनुसार नौ प्रकार के मद (अहंकार) बतलाये गए
हैं, कुलमद, जातिमद, यौवन मद, धन मद, बुद्धि मद,
बल मद, रूपमद, यश मद,
राजसत्ता मद |
इन
मदों में राजसत्ता का मद सबसे भयंकर होता है, इतिहास गवाह है इन मदों के
फेर में रावण जैसा ज्ञानी भी धराशायी हुआ, रावन के पास ये
सभी नौ सम्पदाएँ थी, पुलत्स्य कुल, ब्राहमण
जाति, चिर युवा, अगाध बल, अकूत धन, महा ज्ञानी, कीर्ति
यश संसार भर में फैली हुई परन्तु इसे सभी चीजों का मद हो गया था. उसके विनाश का
कारण यह अहंकार ही था.
दूसरी
ओर समकालीन दशरथ में भी ये सभी गुण थे, इक्ष्वाकु कुल जो ब्रह्मा की
संतान थे दशरथ स्वयम ब्रह्मा के ३८ वे वंशधर थे, क्षत्रिय
जाति, अयोध्या के प्रासादों का वैभव जग विदित था, यश तो इतना था की कहते हैं स्वर्ग से स्वयम इंद्र उन्हें आमंत्रित करते थे
एवं अपने समकक्ष बैठाते थे, बलशाली इतने की प्रथम चक्रवर्ती
सम्राट होने का गौरव था, उनकी राजसत्ता में सभी की इज्जत
होती थी, अथार्थ उन्हें इन नौ मदों में से कोई भी मद नही छू
पाया था, यही कारण था की उनके घर भगवान् स्वयम पुत्र बन कर
आये.
नौ सम्पदाएँ मानव को
नैतिक बनाती है तो इनका अहंकार अनैतिक बना विनाश का कारण भी बनता है. अतः मानव को
५ विकृतियों से दूर जिनमे मद सबसे खतरनाक है दूर ही रहना चाहिए,
यह है अयोध्या के नृप
एवं शासक के चरित्र का दर्शन जिनके लहू को भारत ने पूजा है जिनके वंशज को हमने
ईश्वर माना है |
कैकयी राम संवाद ‘’’
श्री राम चन्द्र को
जब पता चला की कल सुबह उनका राजतिलक होने वाला है तो वे मात कैकयी के कक्ष में
प्रवेश करते हैं
कैकयी : पुत्र, कितना
हर्ष का विषय है मेरा राम आज राजा बनेगा, देखो पूरी अयोध्या
कैसी जगमगा रही है मानो स्वर्ग धरा पर उतर आया हो,
राम: माते ! नमन, सुना
है कल सुबह पिता श्री ने मेरे राज तिलक की व्यवस्था की है, उस
से मैं बहुत दुखित हूँ, आप मुझे सबसे प्रिय हैं माँ मध्यमा,
आप ही मुझे मेरे कर्तव्य से विमुख होने से बचा सकती हैं.
कैकयी: पुत्र, मुझे
विस्तार से बताओ कैसा कर्तव्य, कैसा दुःख, यह तो अपार हर्ष की बेला है,
राम: माते, आप
जानती है जब देवों के देव महादेव एवं स्वयम जगती के निर्माता ब्रह्मा ने आकर कहा
था की मुझे पृथ्वी पर आना है एवं दुष्ट राक्षसों से पृथ्वी के कष्ट मिटाना है,
तब ही मैंने यहाँ आने का निर्णय लिया था, अगर
मेरा राजतिलक हो गया तो मैं तो राज भवन में बंध कर रह जाऊंगा एवं वनों में रहने
वाले सैकड़ों ऋषि मुनि दानवों के अत्याचार से त्रस्त रहेंगे, माते
मेरा आना ही निष्फल हो जायगा.माते आप ही मेरे दुःख को समझ सकती हो एवं कुछ उपचार
कर सकती हो,
कैकयी: हां प्रभु, पुत्र
रूप में जन्म ले आपने हम तीनो माताओं का आपने बहुत कल्याण किया है, पर आपके राजतिलक को कौन स्थगित करवा सकता है, अयोध्या
में कोई भी ऐसा नहीं जिसे आपके राजतिलक के विरुद्ध खड़ा किया जा सके, हां अयोध्या से बाहर की एक है.
राम: माते, कौन
है वे जिन्हें आप इस कार्य हेतु प्रयोग में ला सकती हैं,
कैकयी: मेरी दासी जो
मुझे बचपन से पाल कर बड़ी की है एवं मुझसे अनंत स्नेह रखती है जिसे मैंने कैकय
प्रदेश से अपने साथ लाइ हूँ, मंथरा जो मेरी निजी सेविका है.
राम: माते उसे कैसे
राज़ी किया जाय,
माँ सरस्वती उसके मुख पर विराजमान हो एवं वह कारण बन जाए, माते इस कार्य से आप पर बहुत आपत्तियां आयेंगी, कैसे
मैं यह बोझ आप पर डालूं
कैकयी:: पुत्र, जन
हित में मुझे बलि भी देनी पड़े तो दूंगी यहाँ तो बस अपयश की बात है, मैं यह कार्य करुँगी चाहे पूरी धरा मुझे दोषी मान कलंकित कर दे, मुझे दो वरदान सम्राट से लेने हैं वे मांगूंगी उसके द्वारा आप को अयोध्या
से बाहर वन में भेजूंगी आप बताएं कितना कार्य काल आपको धरा को निशाचर विहीन करने
को आवश्यक हैं
राम: माँ, चौदह
वर्ष तो लग ही जायेंगे,
कैकयी: ठीक अब मुझ पर
छोड़ दें देखिएगा प्रभु यह भक्त आपकी, कैसे आपके कार्य को आयोजित
कराती है,
राम :आप धन्य हैं माँ, चाहे
विश्व आपको न माने पर मैं मानूंगा, जो जानते हैं आपको वे
मानेंगे आप, सचमुच महान हो. कैकेयी श्री रामचन्द्रजी का रुख
पाकर हर्षित हो गई और स्नेह दिखाकर बोली- तुम्हारी शपथ और भरत की सौगंध है,
मुझे अब कोई चिंता नहीं, मैं यह कार्य पूर्ण
करुँगी, अवश्य करुँगी .
राम हमारी आत्मा के
सारथी हैं,
हमारे जीवन के मुक्तिधाम हैं। राम हममे हैं, हम
राम में हैं । यह सकल जगत राम का है, राम सारे कण में हैं।
एक अभिभावक अपने बालक से कुछ भी नहीं चाहता किंतु फिर भी उसके मनःस्थिति की
परीक्षा हेतु उसके सामने हाथ पसार ही देता है।
बाल्मीकि
रामायण में विवरण है,
जब मंथरा कैकई माँ को राम बनवास के लिए सुझाव देती है तब माँ कैकई
कहती हैं :
सत्यम, दानं,
तपः, त्यागो, मित्रता,
शौच मार्जवं
विद्या च
गुरुशुश्रुशा धुर्वान्ये तानि राघवे ||
(वाल्मीकि
रामायण |
अयोध्या कांड | १२|३०|)
श्री राम
चन्द्र जी पूर्ण पुरुषोत्तम थे, किसी भी मानव में जो गुण होने चाहिए सभी
गुण उन में विद्यमान थे इन गुणों का यहाँ वर्णन किया गया है, वाल्मीकि जी के लिखने का तात्पर्य है जो भी मानव इन गुणों से परिपूर्ण
होगा वह भगवान राम के सदृश पुरुषोत्तम होगा, वे गुण हैं,
1.
सत्य...सदा सत्य का मार्ग अपना कर चलन चाहिए, कितनी भी विपदा आये कभी सत्य
का परित्याग नहीं करना चाहिए,
2. दान...जिस
व्यक्ति को जिन वस्तुओं कि आवश्यकता है उसे वह वस्तु उपलब्ध कराना ही दान है, दान
से मन तो शुद्ध होता ही है परलोक भी सुधरता है
3. तप.......इन्द्रियों
पर संयम रखना ही तप है,
कोई जंगलों में जाकर धुनी रमाना तप नहीं है हर मानव को मन से शुद्ध
वचन पर संयम रखना चाहिए कहीं भी व्यर्थ वार्ता या अधिक वार्ता नहीं करनी चाहिए,
मीठा बोलना चाहिए जिससे किसीका ह्रदय व्यथित न हो, कोई ऐसा कर्म नहीं करना चाहिए जो किसीके लिए अहित कारी हो
4.
त्याग....उन सभी वस्तुओं का त्याग जिन से मानसिक अशांति होती है, मोह,
लोभ. क्रोध. क्लेश. मद आदि पांच विकारों का त्याग ही सर्वश्रेष्ट
त्याग है न कि किसी खाने कि वस्तुओं को तीर्थ स्थान में जाकर त्यागना
5.
मित्रता.....सभी जीव धारियों के साथ मित्रता का स्वाभाव ही सही मित्रता है, कटु
वचन न बोल कर मुस्कुरा कर हम सभी का मन मोह सकते है उन्हें मित्र बना सकते हैं
6.
शौच......मन पवित्र हो,
विचार पवित्र हो, कर्म पवित्र हो, आतंरिक समग्र पवित्रता के साथ वही पवित्रता हो, प्रदुषण
मुक्त वातावरण बनायें यह सच्ची पवित्रता है
7.
आर्जव....दूसरों के मन के अनुसार चलने वाला व्यक्ति आर्जव होता है, अर्थात
कभी भी ऐसा कृत न हो जो अन्य के मन को अहितकर हो, हर व्यक्ति
कि इच्छा को, भावना को, दृष्टिगत रख कर
कृत करें, यह सोचें कि अगर आप उसकि जगह होते तो आपसे क्या
कृत चाहते
8. विद्या
...मात्र पुस्तकों का अध्ययन ही पूर्ण विद्या नहीं है, धर्मानुसार
पूर्ण ज्ञान ही विद्या है, उनका तत्व ज्ञान होना चाहिए,
व्यावहारिक उपयोग करना चाहिए,
9.
गुरुशुश्रुशा... सभी बड़ों का सन्मान, आज के युग में बड़ों को
वृद्धाश्रम में भेज देते हैं क्योंकि सेवा से वे हिचकते हैं, गुरु शब्द शिक्षक का तो है ही गुरु बडो के भाव से भी प्रयुक्त है
इन ९ गुणों
का अक्षरशः सत्यापन श्री रामचंद्र के जीवन में था इन्ही गुणों के कारण उन्हें
पुरषोत्तम कहा गया |
कैकई कहती है
राघव में ये नौ गुण हैं जो किसी के जीवन को बड़ा एवं महान करते हैं इन्ही गुणों के
चलते वे पुरषोत्तम है,
उनके बनवास के बारे में मैं सोच भी कैसे सकती हूँ ? यह इकलौता विवरण ही राम कि महत्ता को बताने के लिए पूर्ण है, राम हर सनातन धर्मावलम्बी के मन में बसा है, भारत के
लोक मानस के अपराजेय भाव का नाम राम है, “ऐसो को उदार जग
माहीं, बिनु सेवा जो द्रवत दीन पर राम सरस कोऊ नाहीं”
राम किसी को अकेला नहीं रहने देते, यही कारण
है कि शास्त्र कि पूरी महानायक कि कल्पना राम के सामने छोटी पड जाती है, जहां राम हैं, जीवन है, गति है,
प्रकाश है, उल्लास है भरोसा है, और राम भरोसा ही सबसे बड़ा भरोसा है.
मुझे
प्रख्यात कवि शिव ओम अम्बर कि ये पंक्तियाँ याद आती हैं...
राम व्यक्ति
को नहीं वृत्ति को प्राप्त संज्ञा है|
राम हमारा
चिंतन दर्शन प्रीती प्रकृति प्रज्ञा है|
राम चिरंतन
जीवन-मूल्यों का स्वर्णाभ शिखर है|
राम हमारी
संस्कृति का सारस्वत हस्ताक्षर है|
राम हमारा
कर्म, हमारा धर्म, हमारी गति है |
राम हमारी
शक्ति, हमारी भक्ति, हमारी मति है|
बिना राम के
आदर्शों का चरमोत्कर्ष कहाँ है|
बिना राम के
इस भारत में भारतवर्ष कहाँ है|

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