समय कम है काम है ज्यादा
सरिजल जो आगे बहे, पीछे न आय लौट
वैसे ही बीता समय, करे आयु पर चोट
जिंदगी में गाँठे हीं गाँठे लगी पड़ी है
इन गाँठों को कैसे सुलझाऊँ।
समय है कम काम है ज्यादा
उधार में समय कहाँ से लाऊँ।
कोई तो होगा रकीब
कोई तो होगा हबीब
उलझनों को सुलझा दे जो
गुमराह को राह बता दे जो
ऐसा नशीब कहाँ से लाऊँ।
मौत भी आये तो चैन से
जान भी जाए तो चैन से
जिंदगी की दुशवारियाँ भगा
अरमान जगाए तो चैन से
जिजीविषा न रही अब
अनलहक की बातें हो रही अब
जीने की तमन्ना अब कहाँ से लाऊँ ।
मौत परम सत्य है जानता हूँ
काम बहुत
समय कम मानता हूँ
चरैवेति चरैवेति चला जा रहा हूँ
बुझा हुआ सुबह की लौ सा जला जा रहा हूँ
रात भर जला दीपक
समाप्त तेल हुआ
रोशन करने और तेल कहाँ से लाऊँ।

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