मकर संक्रांति। विस्तृत विवेचन

मकर संक्रांति 
विश्व में जितनी भी प्राचीन संस्कृति हैं उनका पूजन, अर्चन, उत्सव सब कुछ  प्रकृति पर आधारित है, जो संस्कृति या दर्शन या पंथ या धर्म बाद में आये वे व्यक्ति विशेष के विचारों से बने| भारतीय संस्कृति प्राचीनतम संस्कृति एवं दर्शन है, वेदों में देखें तो अराध्य सूर्य, वायु, अग्नि, इत्यादि ३३ देवताओं को माना गया है| भारतीय पुरातन विज्ञान बहुत समृद्ध था, जब विश्व भूमि को चपटी समझता था उसके हजारों वर्ष पूर्व ही हमने नक्षत्रों की गणना कर ली थी| मकर संक्रांति भी एक खगोलीय घटना है, संक्रांति उसे कहते हैं जब सूर्य एक राशि से दूसरी राशि में प्रस्थान करता है, अतः वर्ष में १२ राशियों के अनुसार १२ संक्रांति होती हैं| जब सूर्य धनु से मकर में जाता है तो यह मकर संक्रांति कहलाती है, मकर संक्रांति का विशेष महत्व है, क्यूंकि इस दिन से बसंत के आगमन की भी आहट होती है, देवताओं का दिन एक वर्ष का होता है उसमे छ: महीने की रात्रि एवं छ: महीने का दिन होता है, इन छ: माहों को एक अयन कहते हैं, मकर संक्रांति से देवताओं के दिन का आरम्भ होता है, अतः इसे उत्तरायण भी कहते हैं. जब कर्क राशि में सूर्य प्रवेश करता है तब उसे कर्क संक्रांति कहते हैं और उस समय से देवताओं की रात्री प्रारंभ होती है एवं उसे दक्षिणायन कहते हैं | 
यह तो हुई पौराणिक बात, परन्तु खगोल शास्त्र में सूर्य की परिक्रमा पृथ्वी करते है एवं पृथ्वी अपनी धुरी पर २४.४५ अंश उत्तर-दक्षिण की तरफ झुकी होती है, अतः ११६ अंश तक पृथ्वी घूम कर पुनः ११५, ११४,११३....अंश होते हुए अपने स्थान पर पहुंचती है, जब पृथ्वी ११६ अंश पर पहुंचती है तो उसका गमन दक्षिण दिशा की ओर होता है अतः उस दिन से दक्षिणायन प्रारंभ होता है, उसी तरह जब अपनी धुरी के वास्तविक स्थान से प्रारम्भ कराती है तो उत्तर दिशा की ओर जाने से उत्तरायण कहते हैं. प्रथ्वी हर दिन एक डिग्री गान करती है | खगोल शास्त्रियों के अनुसार यह ७२ वर्ष में एक दिन का सुधार होता है, पिछले ४५५ वर्षों की गणना से पंचांग में यह दिन ११ जनवरी से १५ जनवरी के मध्य रखा जा रहा है, पहले यह २२ दिसम्बर से ही प्रारंभ होता था, आज बी जुलियन केलिन्डर अनुसार उत्तरायण( दिनों का बड़ा होना २२ दिसम्बर से ही होता है)
अथर्व वेद में इस खगोलीय घटना का विस्तृत वर्णन भाग एक के तीसरे अध्याय के दसवें सूक्त में है, 
रायस्पोषप्राप्ति सूक्त ( धन पशु प्राप्ति सूक्त) भाग -1 ऋषिः –अथर्वा, देवता- अष्टका (आठों प्रहर)  (मकर संक्रान्ति –उत्तरायणोदय) अथर्व वेद 3.10.1.प्रथमा ह व्यु वास सा धेनुरभवद्‌ यमे ! सा नः पयस्वती दुहामुत्तरामुत्तरां समाम्‌ !! सर्व प्रथम उषा ने अंधकार को दूर कर के इस संसार की व्यवस्था को स्वनियन्त्रित स्थायित्व के हेतु धेनु प्रदान की. जो हमारे   सब के  लिए दुग्ध के दोहन द्वारा उत्तरोत्तर उन्नति का साधन हो. 2.यां देवाः प्रतिनन्दन्ति रात्रिं धेनुमुपायतीम्‌!   संवत्सरस्य या पत्नी सा नो अस्तु सुमङ्गली!! संवत्सर की दक्षिणायण रूपि रात्रि और प्रतिदिन आने वाली रात्रि दोनों की देवता प्रशंसा करते हैं. प्रति दिन रात्रि को विश्राम के पश्चात जैसे धेनु हमारे लिए मंगल कारी होती है उसी प्रकार संवत्सर की दक्षिणायण रूपि रात्रि से प्रकृति मानो विश्राम के पश्चात जैसे परिवार के एक पत्नी  मंगल कारी होती है. 3.संवत्सरस्य प्रतिमां  यां त्वा रात्र्युपास्महे !    सा न आयुष्मतीं प्रजां रायस्पोषेण सं सृज !! हे रात्रि (दक्षिणायन को) संवत्सर का प्रतिनिधि मान कर हम तुम्हारी प्रशंसा करते हैं. प्रजा को वनस्पति,अन्न, पुत्र पौत्रादि से  चिरंजीवि बनाती हुई रायस्पोष –धन और पशुओं से समृद्धि का साधन बनती हो.  5.वानस्पत्या ग्रावाणो घोषमक्रत हविष्कृण्वन्तः परिवत्सरीणम्‌ ! एकाष्टके सुप्रजसः सुवीरा वयं स्याम पतयो रयीणाम्‌ !! प्रकृति के वर्ष प्रति वर्ष होने वाले संवत्सरीय यज्ञ में उर्वरक मृदा द्वारा वनस्पति उत्पन्न हो कर आनंद घोष करते हैं. जिन के प्रतिदिन अनुग्रह से सुंदर वीर प्रजा पुत्र पौत्रादिक विविध समृद्धियों के स्वामी बनें. 
उत्तरायण में सूर्य के प्रवेश का अर्थ कितना गहन है और आध्यात्मिक व धार्मिक क्षेत्र के लिए कितना पुण्यशाली है, इसका अंदाज सिर्फ भीष्म पितामह के उदाहरण से लगाया जा सकता है। महाभारत युग की प्रामाणिक आस्थाओं के अनुसार सर्वविदित है कि उस युग के महान नायक भीष्म पितामह शरीर से क्षत-विक्षत होने के बावजूद मृत्यु शैया पर लेटकर प्राण त्यागने के लिए सूर्य के उत्तरायण में प्रवेश का इंतजार कर रहे थे।
मत्स्य पुराण और स्कंद पुराण में मकर संक्रांति के बारे में विशिष्ट उल्लेख मिलता है। मत्स्य पुराण में व्रत विधि और स्कंद पुराण में संक्रांति पर किए जाने वाले दान को लेकर व्याख्या प्रस्तुत की गई है। परंपरागत आधार पर मकर संक्रांति प्रति वर्ष 14 जनवरी को पड़ती है। पंचांग के महीनों के अनुसार यह तिथि पौष या माघ मास के शुक्ल पक्ष में पड़ती है। 
इस दिन का खास महत्व यूँ भी है की भारत एक कृषि प्रधान देश रहा है, इस दिन से  होली तक की कटाई तक कृषि में विशेष समय माना जाता है, पंजाब में लोहड़ी मकर की पूर्व संध्या पर धूम धाम से किसान मनाते हैं, इसी प्रकार भारत के हर क्षेत्र में इसे विभिन्न नामों से मनाया जाता है|
मकर संक्रान्ति : छत्तीसगढ़, गोआ, ओड़ीसा, हरियाणा, बिहार, झारखण्ड, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, मणिपुर, राजस्थान, सिक्किम, उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, बिहार, पश्चिम बंगाल, और जम्मू; ताइ पोंगल, उझवर तिरुनल : तमिलनाडु; उत्तरायण : गुजरात, उत्तराखण्ड ; माघी : हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, पंजाब ;भोगाली बिहु : असम ;शिशुर सेंक्रात : कश्मीर घाटी ; खिचड़ी : उत्तर प्रदेश और पश्चिमी बिहार; पौष संक्रान्ति : पश्चिम बंगाल ; मकर संक्रमण : कर्नाटक; विभिन्न नाम भारत के बाहर: 
बांग्लादेश : Shakrain/ पौष संक्रान्ति ; नेपाल : माघे सङ्क्रान्ति या 'माघी सङ्क्रान्ति' 'खिचड़ी सङ्क्रान्ति'; थाईलैण्ड : सोङ्गकरन, लाओस : पि मा लाओ; म्यांमार : थिङ्यान; कम्बोडिया : मोहा संगक्रान; श्री लंका : पोंगल, उझवर तिरुनल

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