निराशा

न  किसी चमन का मैं महकता  गुलाब हूँ 
न किसी फिजा का मैं थिरकता शबाब हूँ 
सुखी  पतझड  की पत्तियों  का नशीब हूँ 
हवा   में   डोलती    पतंग  के  करीब  हूँ 

अब   तितलियां  हैं  सिर्फ  मेरे  करीब में
बची   मधुकर  की   गुंज  मेरे  नशीब  में
वे  भी  ले  समस्त  मकरंद अब उड़ गयी
लुटी  तकदीर  मेरी  किस  राह  मुड गयी

हालात  ने  ऐसा  हाल  किया  क्या  कहूँ 
उठा  गर्दिश में क्यों डाल  दिया क्या कहूँ 
सोच   सोच   कर  बैचैन   था  क्या  कहूँ 
न रहा आज किसीके काम का क्या कहूँ 

घर  रोशन  कर  सकूँ  वो  शमादान नही 
सजा  सकूँ  आँगन  को  वो सामान नही 
गले    लगाये    ऐसा   मेहर   बान   नही 
उम्र   है    तजुर्बा  है  पर  कद्रदान   नही 




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