अयोध्या की कहानी 6 दिसंबर की एक कारसेवक की जुबानी
6-दिसम्बर …दो
सब कुछ आँखों के सामने है। सबकुछ छाया हुआ है मन-मष्तिस्क पर। जीवन को धन्य करने वाला पल; पांच सौ वर्षों का कलंक आने वाले पांच घंटों में मिटने को है।
अपने अभ्यस्त अनुशासन में बन्धा मैं तत्काल मोर्चे पर आ गया; और गुम्बन्द तोड़ने वाले कारसेवकों को रोकने लगा। पता नहीं कहां से हाथ में एक डंडा भी आ गया। दो सौ मीटर से अधिक लम्बे-चौड़े मैदान में इस कोने से उस कोने तक दौड़-दौड़ कर ‘तोड़क’ कारसेवकों को रोकने/डांटने में लगा। चालीस वर्ष का व्यायाम साध्य शरीर, तृतीय वर्ष प्रशिक्षण का आत्म-विश्वास और संघी निकर … पूरे मैदान में सब मुझसे बच-बच कर निकलते। आधे गुम्बन्दों को तोड़ने जा रहे हैं तो कुछ टूटे हिस्सों को प्रसाद रूप में अपने सिर पर ढोकर लौट रहे हैं। मंच से जोश भरने वाले आह्वान सुनाई दे रहे थे , - “… कोई कारसेवक खाली हाथ न जाए। सब यथायोग्य प्रसाद पाकर ही जाएं। भरोसा रखें, सबको प्रसाद मिलना है और भरपूर मिलना है …”
और ऐसा ही प्रसाद रूपी 5-6 टूटी ईंटों का गट्ठर सिर पर उठाए एक बीस-बाईस वर्षीय युवक बहुत उत्साह-उमंग से सामने आ गया। मैं चीखकर उसे रोक ही रहा था कि उसने आँखें लाल करके चेतावनी दी – “हट जा… वरना सिर फ़ोड़ दूंगा … ” एकदम मरने-मारने पर ऊतारु कारसेवक। उसने जो भी कहा हो; मैंने भीतर से सुना – “अरे! यह तो टूटने लगा है ढाँचा… यही तो सपना है मेरा भी। क्या कर रहा हूँ मैं? जीवन की साध पूरी हो रही है, और मैं अपने ही लादे हुए अनुशासन के पार कुछ देख ही न पा रहा। संगठन को मानने की एक सीमा है, उसके ऊपर तो जन्मों-जन्मों से चली आई साध है; राम का काम है…”
साथ ही स्मरण आया 1989 अक्टूबर-नवम्बर की कारसेवा में शहीद हुए राम-शरद का बलिदान। पहले दिन कारसेवा होने का रोमांचक समाचार भी स्मरण आया। वाराणसी की जेल में ज्योंही बीबीसी की खबर आई कि अयोध्या में कारसेवा हो गई… तो जेल की एक ही बैरक में कैद तीन सौ करीब कारसेवक नाच उठे। जिस पुलिस से पहले दिन बुरी तरह पिटे थे, उसी पुलिस को कंधे पर बिठाकर नाच रहे हैं कारसेवक। पुलिस की लाई मिठाई भी उनके साथ बांट कर खा रहे हैं …
और दूसरे दिन राम-शरद सहित सैंकड़ों कार सेवकों के बलिदान का समाचार पाकर फ़ूट-फ़ूट कर रोया कि मैं क्यों न हुआ उनकी जगह! … सिर्फ़ प्रतीकात्मक कारसेवा से इतना आल्हाद मिला, तो अब तो पूरा का पूरा ढाँचा ही … हे राम … और मैं रोकने में लगा हूँ इस महान कार्य को?
सोचने का समय नहीं था। दौड़कर अपने टैंट में पहुँचा, निकर उतारी और जीन्स बनियान पहनकर उसी सांस दौड़कर आया मैदाने-जंग में। अब पूरा दृश्य बदला दिख रहा है। अब चारों तरफ़ जोश, उत्साहा, उमंगभरा उत्सव।
एक रस्सी से लटककर बन्दर की तरह लगभग सौ मीटर ऊँचे गुम्बद पर पहुँचा, पास ही पड़ी लोहेए की छड़ उठाई और लगा प्रहार करने। जाना कि राक्षसाकार है ढाँचा, और उतना ही मजबूत भी। यह तो धराशायी होने के बाद ही जाना कि डेढ-दो मीटर चौड़ी थी दीवारें! इन्सानी हाथों से उनका टूटना चमत्कार के सिवा कुछ नहीं हो सकता…।
… … जारी, अभी मन्दिर बनाना शेष है …

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