लज्जा लज्जित नहीं

निर्भया कांड पर यह कविता लिखी थी , अगर समय रहते उपचार हो जाता हमारे न्यायालय सबसे बड़े कसूरवार हैं कठोरतम दंड अगर तुरंत सुनाया है तो आधे जुर्म यूँ ही खत्म हो जाएं। पर दुर्भाग्य न्यायालयमें वही और बाहर भी सब जगह राजीनीति ।

लज्जा लज्जित नही लज्जित है यह घृणित समाज 
सांस्कृतिक धरोहर का वैदिक भारत कहाँ गया आज 
शर्मसार हो  अंगार उगलते शब्द भी चुप से हो रहे 
नारी अस्मिता, शुचिता, के टुकड़े देख नयन रो रहे 
दुर्गेशनंदिनी को पूजा जिन हाथों ने  वही स्तब्ध हैं
सिंहवाहिनी के मंत्रोचार भी अक्षम हो अनुपलब्ध हैं 

हे भारत की नारी सहनशील- तू अति धीर सदृश पृथा
अनल-मध्य-तपे ममता-कोमलता-शीतलता, तेरी व्यथा  
हे नारी जाग तू वासना के महिसासुर का संघार कर 
तू भारत की नारी  उज्जवल देदप्य ज्योत प्रमाण कर
सत रक्षा-सावित्री परीक्षा-यही शिक्षा, करे देश उत्थान
पुरुष सदृश कर्मठ, तेरा दूध महान- तेज भानु समान 

दुर्बलता मन की, परिणाम होते पाशविकता के दुर्गम 
अशिक्षा, रुढिवादिता, मूल रूप व्यभिचार के उद्गम 
क्षणिक कामनापूर्ति विचारतंतुओं पर होती आक्रान्त
पञ्च विकार ही अंतर मनुज और पशु में आप्लवांत  
जन चेतना से, नारी उत्पीडन से, निवृतसमाज होगा 
यह रोगहै मानवता पर कलंक, विष से उपचार होगा

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