बाल दिवस

बाल दिवस

वह देखो 
एक छोटा बच्चा
काँधे पर बोरा उठाये
कुछ कचरे से बिन रहा है,
अपने भविष्य को 
उस कूड़े के ढेर में ढूंढ रहा है।
उसका बाल दिवस
उसकी बोरी में चुने हुए
प्लास्टिक के टुकड़े में अकड़ा पड़ा है।
लगता है आज़ादी के इतने वर्ष बाद भी
बाल दिवस वहीँ जकड़ा पड़ा है ।
उसका स्कूल 
उसकी पेट की भूख में
कहीं खो  गया है,
खेलने के खिलौने
चन्दा मामा लेकर सो गया हैं ।
हंसी तो उसकी 
माँ की झोली में सिमट 
छोटी बहन के गीत में बह गयी है 
बाल दिवस बस रस्म अदायगी रह गयी है।
भारत का भविष्य 
क्या यूँ ही बिखरा होगा,
सच्चा बाल दिवस तो तब होगा 
जब हर फुल डाल पर खिला होगा |

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