सूफी भजन

विरहानल   में यूँ   जली, जैसे   जले  पतंग
श्याम पिया बैरी भया, नस नस लगी अनंग ।

पिया   मोसे  कैसो  किये  जायें  छल रे
छोड़  मुझे   है  काहे  दृग  से ओझल रे
पिया मोसे...

जनम जनम की प्यासी विरहणी  मैं तो
विचरु  बावरी सी  चंचल हिरणी  मैं तो 
वन   वन  ढुंढी  देखी नैनन  हर पल  रे 
पिया मोसे...

माया  वन  में मिरग सो  मन  मेरो भयो 
मक्कड़  जाल  संसार  सारो  वन  रह्यो
टूट्यो प्राण  पिंजरों, छुट्यो  कलकल रे
पिया मोसे...

राग  द्वेष  के कलुष  मेघ  छाये   वन में
मोह  लोभ   मत्सर बरसे  गहरे  घन  में
माटी की  काया  धंसी  गहन दलदल  रे
पिया मोसे...

नैना   तोसे  लगाय  के  मस्त   मैं  चली
काल अलि   बन्यो, कली  पस्त में ढली
इंदु  तन पिया बिन  तड़पे है  हर पल रे
पिया मोसे....

ऊंच   नीच  की   नैया   मेरी  पार  करो
पिया   तू    बड़ो   खेवैया  उद्धार  करो
इंदु  अरदास  तू  करदे  आज सुफल रे
पिया मोसे....

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