पदावली, विधा


पद / अष्टपदी / षष्टपदी / प्रवार्धित्पदी लेखन
( श्वेताभ पाठक जी के सहयोग से )

प्रिय साहित्य सुधि मित्रों ! आज मैं आपको एक ऐसी काव्य विधा से अवगत करा हूँ जिस विधा के अभाव में सम्पूर्ण साहित्य और काव्य नीरस है और जिस विधा के बिना काव्य परम्परा अधूरी है !
यह विधा आज के समय में लगभग विलुप्ति के कगार पर है ! ग़ज़ल , गीत इत्यादि के कोलाहल में इस विधा को काव्य समाज लगभग भूल सा गया है !
यह विधा है पद / अष्टपदी / षष्टपदी / प्रवार्धित्पदी लेखन ! यह विधा प्राचीन विधा है काव्य की जब गीत , ग़ज़ल इत्यादि नहीं थे ! इसी विधा से गीत इत्यादि का प्रादुर्भाव हुआ है !
यह पद्य विधा भक्तिकालीन युग का प्राण है ! भक्तिकालीन युग में पूर्णतः सभी कवियों ( भक्तिमार्ग अनुयायी / सूफी परंपरा ) इत्यादि ने इसी विधा में अपनी रचनाएँ की है !
अष्टछाप कवियों ने ( सूरदास , परमानंददास , नाभादास , कुम्भनदास , गोविन्द स्वामी , छीतस्वामी , चतुर्भुजदास , कृष्णदास ) इसी विधा में अपनी सभी रचनाओं को कलमबद्ध किया है !

यह मध्ययुगीन काल की सबसे प्रचलित विधा थी जिसके अंतर्गत तानसेन , बैजू बावरा , हरिदास जी आदि बड़े बड़े संगीतज्ञ इसी विधा में गायन करते थे ! भक्ति से सम्बंधित ( सगुण धारा / निर्गुण धारा ) के सभी कवि संत ( मीराबाई , तुलसीदास , रैदास , कबीरदास , रहीमदास , नानक , तिरुवल्लुवर , ज्ञानेश्वर , मलिक मुहम्मद जायसी इत्यादि ) सभी ने इसी विधा में काव्य सरिता , ज्ञान गंगा , भक्ति पियूष को बहाया !

यह विधा मुख्यतः भगवान् से विनय करने हेतु , प्रेम हेतु , माधुर्य , विरह , करुण रस , और उपदेश जैसी अवस्थाओं को निसृत करने हेतु ही होती है ! यह एक ऐसी विधा है जिसमें काव्य, संगीत के माध्यम से स्वतः ह्रदय से निकलता है ! इसे ध्रुपद गायन भी कहते थे !
मीराबाई , सूरदास , तुकाराम , कबीरदास इत्यादि कभी कलम इत्यादि लेकर नहीं बैठते थे ! भगवदप्रेम में व्याकुल इन प्रेमियों के ह्रदय से स्वयं ही अविरल काव्य धारा फूट पड़ती थी जिसे लिपिबद्ध करते थे उनके सहचर !

आज भी शास्त्रीय संगीत प्रेमियों के लिए यह विधा किसी अमृत से कम नहीं ! भारत रत्न पंडित भीमसेन जोशी , पंडित जसराज , गिरिजा देवी , सुब्बलक्ष्मी इत्यादि सभी शास्त्रीय संगीत के गायक या वादक इसी पद विधा के अनुगामी हैं !
यह विधा जितनी हिन्दुओं में प्रचलित थी उतनी ही सभी मुस्लिम कवियों के मध्य भी ! सभी सूफी संतों ने इस विधा को अपनाकर अपनी रचनाएँ की हैं !
यह विधा इसीलिए भी प्रचलित थी और है क्यूंकि संगीत शास्त्र के सभी रागों में इन पदों का गायन संभव था जैसे राग बिलावल , राग यमन , राग मेघ , राग मल्हार , राग दीपक , राग भैरव , राग बाग्श्री , राग मालकौंस , राग हमीर , राग सिन्दूरा , राग वसंत इत्यादि !

आईये दिए गए लिंक के माध्यम से इसको समझने का प्रयास करें ! आपको भी बहुत अच्छा लगेगा और मुझे पूर्ण विश्वास है की ये जो लिंक मैंने यहाँ दिए हैं उसको सुनकर , समझकर आप सभी का पदावली की तरफ अवश्य आकर्षण और मोह उत्पन्न होगा !

https://www.youtube.com/watch?v=-W5U53LMsU0

https://www.youtube.com/watch?v=8fq8EyqFRmM https://www.youtube.com/watch?v=gSwgS64IQpY https://www.youtube.com/watch?v=jTfjG2m2n0Q

शायद यह गाना सबने सुना होगा मुग़ल ए आजम का :
https://www.youtube.com/watch?v=H4y8tXUlJjA

मोहें पनघट पे नंदलाल छेड़ गयो रे !

अलबेला सजन आयो री ! इस पद को हम दिल दे चुके सनम , डेल्ही 6, बाजीराव मस्तानी में सबने सुना ही होगा ! ऐसे हज़ारों पद बॉलीवुड मूवीज और फिल्मों में लिए गये हैं !
ये सब संगीत सुनने में कर्णप्रिय और आनंददायक लगते हैं !

यह विधा गीत , ग़ज़ल , गीतिका विधा की जननी है !

आईये कुछ इसकी विधा पर प्रकाश डालें !

यह मात्रिक छंद में होता है !
भाषा : बृज , अवधी , भोजपुरी , संस्कृत , खड़ी बोली , गुजराती , मराठी किसी भी क्षेत्रिय भाषा ! या सभी भाषाओँ का मेल जैसे कबीरदास जी की खिचड़ी भाषा !

इस छंद में चार से अधिक पद होते हैं अर्थात पंक्तियाँ होती हैं ! पहली पंक्ति को टेक कहते हैं जिसे प्रथम चरण भी कहा जाता है ! इसी के आधार पर पूरी रचना कही जाती है ! यह पंक्ति 10, 11, 12 , 13 , 15 , 16 , 18 , २० , 22 , 24 मात्राओं तक की हो सकती है ! यह पंक्ति सम मात्राओं की भी हो सकती है और विषम मात्राओं की भी हो सकती है !
इसके बाद दूसरी पंक्ति दो चरणों की होती है जिसमें एक निश्चित मात्रा के बाद यति होती है !

कुछ उदाहरण :

मेरो मन अनत कहाँ सुख पावै ! ( 16 मात्रा )
जैसे उड़ि जहाज को पंछी , पुनि जहाज पर आवै ! ( 14 , 14 पर यति )

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बसो मेरे नैनन में नंदलाल। ( 19 )
मोहनि मूरति, साँवरि सूरति, नैना बने विसाल।। ( 16 , 11 )
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अलबेला सजन आयो री ! ( 15 )
चौक पुराओ , मंगल गाओ , मन रंग निशि पायो री ! ( 16 , 13 )
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जाके प्रिय न राम वैदेही ! ( 16 )
तजिए ताहि कोटि बैरी सम , यद्यपि परम सनेही ! ( 16 , 11 )

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मनु तुम श्रद्धा को गए भूल ! ( 16 )
उस पूर्ण आत्म विश्वासमयी को , उड़ा दिया था समझ तूल ! ( 16 , 14 )

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जिन्हैं हरि भगति पियारी हो ! ( 15
मात पिता सहजै छूटे , छूटे सुत अरु नारी हो ! ( 14 , 14 )

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फल भखिहैं फिर सब उड़ि जइहैं ! ( 16 ) जब लौं रसमय फल लटकत रह , तब लौं खगदल नित चहचइहैं ! ( 16 , 16 )

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दीखै नित , चहुँदिशि मोहें नीलाभ ! ( 19 ) शीश मुकुट कर मुरलि सुशोभित , पहिने रे पीताभ ! ( 19 , 11 )
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करो सब हिंदी का सम्मान ! ( 14 ) रंजन करती नितप्रति बहती , रग रग हिंदुस्तान ! ( 16 , 10 ) प्रादेशिक भाषा की जननी , भाषा की विज्ञान ! ( 16 , 10 )
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हम तो प्रेम नगर के वासी ! ( 16 ) जहाँ रहत आनंद चन्द्र नित , बनकर पूरनमासी ! ( 16 , 12 )

तो इस प्रकार आपके मन में जो भी भाव आये आप उसे पद्य के माध्यम से निसृत कर सकते हैं ! एक पूरे पद में कम से कम चार चरण होने चाहिए और ज्यादा से ज्यादा आप कितने भी कर सकते हैं ! पर ज्यादातर पद के 6 , 8, और 10 चरण ही लिखे गये हैं ! मैंने 32 चरणों तक का भी पद लिखा है !

आप सभी से अनुरोध है कि कल सीखने सिखाने की कार्यशाला के अंतर्गत सभी लोग पद के माध्यम से अपनी प्रस्तुति दें ! वह किसी भी विषय पर हो सकता है ! मूलतः सबसे सरल चौपाईं या अरिल्ल छंद का टेक होता है जिसके आधार पर प्रायः पद लिखा जाता है ! इसकी मात्रा संख्या 16 होती है ! और यति भी 16 , 16 मात्राओं पर होता है !

आईये हम सभी संकल्प लें की इस पुरातन विधा के पुनर्जीवित करने का कार्य करें ! ऐसा वातावरण उत्पन्न करे की जैसे ग़ज़ल एक बच्चा बच्चा भी लिख रहा है , उसी प्रकार पद विधा को भी बच्चा बच्चा अपनी कलम में ढाल ले !
मुझे आशा है आप सभी लोग मेरे इस स्वप्न को साकार करने में मेरा सहयोग अवश्य करेंगे ! पदावली के माध्यम से हिंदी और उसकी क्षेत्रीय भाषाओं का विकास , प्रचार प्रसार पूरे विश्व में होना चाहिए !

मूलतः सबसे सरल चौपाईं या अरिल्ल छंद का टेक होता है जिसके आधार पर प्रायः पद लिखा जाता है ! इसकी मात्रा संख्या 16 होती है ! और यति भी 16 , 16 मात्राओं पर होता है !

पियूष पदावली द्वारा आप सभी को काव्य की समस्त विधाओं से अवगत करवा कर उसमें आप सभी को निष्णात बनाये जाने का संकल्प है !


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