31 अक्टूबर 1984, मेरा संस्मरण

आज ३१ अक्टूबर है याद आता है १९८४ में आज के दिन मैं सुबह जमशेदपुर से कोलकाता आया था, ट्रेन में कोई रैली थी एसी फर्स्ट में भी लोग दरवाज़ा तोड़ कर घुस रहे थे और जो यात्री थे उन्हें घसीट कर बाहर कर जगह हथिया रहे थे, कैसे तैसे रात निकली और होटल एचएचआई में रुका था, होटल के कमरे में ही लोगो को बुलवा लिया था जिनसे मीटिंग करनी थी, करीब १२ बजे पता चला की इंदिरा जी को गोली मार दी गयी है और उनकी हालत ठीक नही है | शहर में दंगा के से हालत उत्पन्न हो गए थे, मैं और मेरे सीनियर डायरेक्टर पार्टनर जो दिल्ली से थे ने निश्चय किया की अब हमें जैसे भी हो घर के लिए प्रस्थान करना चाहिए पर मुख्य समस्या यह थी की स्टेशन कैसे पहुंचा जाय दिल्ली के लिए राजधानी ५ बजे और टाटा के लिए स्टील ५.३० पर निकलती थी, भुरारिया जी ( सीनियर डायरेक्टर पार्टनर) के एक मित्र होटल के ठीक सामने वाली सड़क लार्ड सिन्हा रोड में रहते थे नंदू टिबड़ेवाल नाम था, उसको फोन किया, वे अपनी गाड़ी लेकर आये और गली गली से किसी तरह हावड़ा स्टेशन पहुंचाए|
बात इंदिरा जी की हो रही थी, उनका राजनैतिक जीवन सुदृढ़ करना ही नेहरु जी का उद्देश्य था, राजनीती में रहते हुए भी उनको अपने शासनकाल में नेहरु जी ने कोई पद नही दिया न कोई मंत्रालय. उनकी दिली इच्छा थी की उनके मृत्यु के बाद या कहें उनके बाद इंदिरा ही प्रधान मंत्री बने, १९६४ में उनकी अकस्मात मृत्यु के बाद इंदिरा जी को प्रधानमंत्री बनाने की पूरी तयारी थी पर मोरारजी भाई के अड़ जाने से ऐसा चेहरा खोजा गया जो अविवादित हो और जिसके नाम पर कोई आपत्ति न कर सके इस प्रकार लालबहादुर शास्त्री का चयन हुआ | आज कल तो राजनैतिक पुस्तकों का इतना चलन नही है पर उन दिनों बहुत पुस्तकें निकलती थी और खूब चलती थीं, उनमे कुलदीप नैयेर की इंडिया द क्रिटिकल इयर्स, और बीटवीन द लाइन्स बहु चर्चित थी, जिन मित्रों ने ये पुस्तके पढ़ी होंगी उन्हें स्पष्ट तौर पर यह पता होगा की कामराज प्लान से शुरू यह सत्ता की लड़ाई की बिसात कैसे सजाई गयी थी. किस तरह नेहरु जी ने अपनी आकांक्षा की पूर्ति हेतु समझौता किया था. 
तीन निर्णय इंदिरा के जिन्होंने इंदिरा को भारतीय राजनीती की लौह महिला कहा गया | प्रिवीपर्स की समाप्ति, बैंक का सरकारी करण और बंगला देश की विजय|
आर्मी ने एक प्रस्ताव सरकार को दिया था की ९० हज़ार सैनिकों के बदले हम कश्मीर ले लेते हैं एक तो कश्मीर समस्या सदा के लिए सुलझ जायगी दुसरे पाकिस्तान पूर्व और पश्चिम में आपस की लड़ाई में ही उलझा रहेगा. पर इंदिरा जी ने प्रस्ताव ठुकरा दिया. 
१९६९ में कांग्रेस दो फाड़ हो चुकी थी सिंडिकेट मोरारजी देसाई के नेतृत्व में अलग था, निजलिंगप्पा इत्यादि का वर्चस्व था, परन्तु इन सबसे पिता की सिखाई कूटनीति से इंदिरा ने बखूबी निपटा| भगवान दास (इंडिया आफ्टर एंड बिफोर इंडिपेंडेंस), एम् सी छागला ( द रोजेज इन दिसम्बर) इत्यादि में सत्ता की लड़ाई का एवं भारतीय राजनीती का सजीव वर्णन है | १९९९ में लिखी पुस्तक इंडिया आफ्टर इंडिपेंडेंस-बिपिन चन्द्र, मृदुला मुख़र्जी ने तो इंदिरा के आरंभिक शासन को बहुत दुर्भाग्यपूर्ण बताया उनके आर्थिक निर्णय सारे गलत थे खाद्यान्न की स्तिथि बहुत बुरी थी पी एल ४८० पर हम निर्भर थे (पेज २२२) १९६५ के युद्ध के बाद IMF ने सहायता देनी बंद कर दी थी. मजबूरन इंदिरा जी को पहली बार रूपये का अवमूल्यन वह भी ३५.५% करना पड़ा था. 
भारतीय राजनीती में अगर सही कहें तो १९६७ का चुनाव एक नया मोड़ था, जब कई राज्यों में संगठन की सरकार बनी, समाजवादी पार्टी कई हिस्सों में बाँट कर , सिंडिकेट को छिन्नभिन्न कर इंदिरा ने पुनः साबित कर दिया की वह राजनीती की सफल खिलाडी है. बाद के चुनाव में तो सिंडिकेट के स्ताल्वार्ट  इसके अध्यक्ष कामराज, बंगाल से अतुल्य घोष, मुंबई के एस.के.पाटिल, सभी चुनाव जितने में तो असमर्थ रहे ही बल्कि सिंडिकेट के टूटने के कारण भी बने. इंदिरा तब तक निर्विवादित सत्ता का केंद्र बन चुकी थी , विपक्ष टुकड़ों में बंटा था, स्वतंत्र पार्टी जनसंघ में विलय को आतुर थी, ६७ से ६९ का समय सत्ता के गलियारे में संक्रामक काल कहा जा सकता है. १९६९ से १९७३ तक इंदिरा बेताज बादशाह थी, इस काल में ही उन्होंने कई निर्णय लिए जिनके कारण वह याद की जाती रही, १९७३ में यंग तुर्क इंदिरा के सलाहकार के रूप में उभरे, ज़रीर मशानी ने लिखा है की यंग तुर्क के कहने पर कांग(आई) वाम पार्टी एवं अन्य सम-विचार वाली पार्टी की और झुकना प्रारंभ किया जबकि सिंडिकेट ने दक्षिण धरा की पार्टियों जनसंघ, स्वतंत्र, की तरफ झुकना शुरू किया. डॉ. जाकिर हुसैन की मृत्यु के बाद के हुए चुनाव में कांग्रेस के अधिकारिक उम्मीदवार संजीव रेड्डी के विरुद्ध अपना उम्मीदवार खड़ा कर एवं उसे जीता कर भारतीय राजनीती में एकछत्र साम्राज्य स्थापित किया.

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